नक्सलियों के कब्जे से छूटे जवान राकेश्वर सिंह ने सुनाई आपबीती
राकेश्वर को छुड़ाने में भूमिका निभाने वाले मध्यस्थों में से एक धर्मपाल सैनी को बस्तर का गांधी कहा जाता है. वो 60 के दशक से ही बस्तर में रह रहे हैं.
छत्तीसगढ़ में 3 अप्रैल को हुई मुठभेड़ के बाद नक्सलियों की ओर से बंधक बनाए गए कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास की गुरुवार शाम रिहाई हो गई. एक मध्यस्थता समिति की पहल के बाद नक्सलियों ने उन्हें छोड़ा. मध्यस्थता की मांग नक्सलियों ने ही की थी.

राकेश्वर को पद्मश्री धर्मपाल सैनी के नेतृत्व में बनी टीम ने छुड़ाया. धर्मपाल सैनी को बस्तर का गांधी भी कहा जाता है. तीन अप्रैल को टेकलगुड़ा में हुई मुठभेड़ में नक्सलियों ने राकेश्वर को बंदी बना लिया था. नक्सलियों ने उनकी तस्वीर जारी कर बताया था कि वो सकुशल हैं.
किन लोगों ने की मध्यस्थता
राकेश्वर को छुड़ाने के लिए धर्मपाल सैनी के साथ गोंडवाना समाज के अध्यक्ष तेलम बौरैय्या, रिटायर्ड शिक्षक जयरुद्र करे, बीजापुर के मुरतुंडा की सरपंच सुखमती हक्का ने मध्यस्थता की.
नक्सलियों के चंगुल से छूटे राकेश्वर सिंह ने बताया कि वे हमले के बाद बेहोश हो गए थे. उन्हें जब होश आया तो नक्सलियों ने उन्हें बंदी बना लिया. उन्होंने बताया कि नक्सली छह दिन तक उन्हें अलग-अलग गांव में घुमाते रहे. हालांकि, किसी ने उनके साथ बुरा सुलूक नहीं किया.
नक्सलीयों ने राकेश्वर सिंह को 12 गांव के लोगों की जन अदालत के बाद छोड़ने का फैसला किया था. यह जनअदालत तुमलगुड़ा में लगाई गई थी. इसमें एक हजार से ज्यादा लोग मौजूद थे. उन सभी की हामी के बाद राकेश्वर को छोड़ा गया.
जिस दिन राकेश्वर को बंदी बनाया गया, उसी दिन धर्मपाल सैनी को इस बात की सूचना मिल गई थी. पत्रकारों के सवाल के जवाब उन्होंने कहा, ''नक्सलियों और पुलिस के बीच एक विश्वासपात्र व्यक्ति की जरूरत थी. उन्हें नहीं पता कि उनके नाम पर सहमति कैसे बनी, लेकिन जब मध्यस्थता करने के लिए कहा गया तो वे फौरन तैयार हो गए.''
उन्होंने कहा कि नक्सलियों से बात करने के बाद अन्य मध्यस्थों की भूमिका तय हुई. इसमें जय रुद्र करे, तेलम बोरैया, सुखमती हपका भी हमारे साथ थे.''
कौन हैं धर्मपाल सैनी
मध्य प्रदेश के धार जिले के निवासी धरमपाल सैनी विनोबा भावे के शिष्य रहे हैं. आगरा विश्लविद्यालय से कॉमर्स ग्रेजुएट सैनी ने 60 के दशक में बस्तर की लड़कियों से जुड़ी एक खबर पढ़ी थी. खबर यह थी कि दशहरा के मेले से लौटते वक्त कुछ लड़कियों के साथ कुछ लड़कों ने छेड़छाड़ की. लड़कियों ने उन लड़कों के हाथ-पैर काट कर उनकी हत्या कर दी थी. यह खबर सैनी के मन में घर कर गई. उन्होंने बस्तर की लड़कियों की हिम्मत और ताक़त को सकारात्मक बनाने की ठानी.

वो अपने गुरु विनोबा भावे से इजाजत लेकर बस्तर आए. विनोबा ने उन्हें 5 रुपये का एक नोट लेकर उन्हें बस्तर भेजा था और कम से कम 10 साल बस्तर में रहने को कहा था.
सैनी खुद भी एथलीट रहे हैं. बस्तर में उन्होंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15-20 किमी आसानी से चल लेते हैं. इसे देख उन्होंने बच्चों की इस क्षमता को खेल और शिक्षा में इस्तेमाल करने की योजना बनाई. उनके डिमरापाल स्थित आश्रम में हजारों की संख्या में मेडल्स और ट्रॉफियां रखी हुई हैं.
जय रुद्र करे दंतेवाड़ा के रिटायर्ड शिक्षक हैं. रिटायरमेंट के बाद से ही वे धर्मपाल सैनी से जुड़कर काम कर रहे हैं. वहीं, मुरदंडा के रहने वाले तेलम बोरैया पूर्व शिक्षक हैं. पिछले चार साल से वे गोंडवाना समाज के अध्यक्ष हैं.
92 साल के धर्मपाल सैनी को लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए 1992 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. वे सालों से बस्तर में आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं.
सुखमती हपका ने भी मध्यस्थ की भूमिकी निभाई. वे मुरदंडा की पूर्व सरपंच रह चुकी हैं. फिलहाल वह एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ ही गोंडवाना समाज की उपाध्यक्ष भी हैं.
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